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قصری از آن دست پُرنگار و بهآئین
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| که تنها |
| سر پناهکی بود و |
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| بوریایی و |
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| بس. | ||
| کی گذشت و کجا |
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| آن وقعهی ناباور |
| که نانپارهی ما بردهگان ِ گردنکش را |
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نانخورشی نبود
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که گاه به ماهی میکشید و
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| گاه |
| دزدانه |
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از مرزهای خاطره
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| میگریخت، | ||
| که تاراندن ِ شورچشمان را |
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| کَلَکی بود |
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| پنداری. | ||
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و ما دو
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| دست در انبان ِ جادویی شاهسلیمان |
| در خوانچههای رنگینکمان |
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| ضیافت میکردیم. |
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هنوز آسمان از انعکاس ِ هلهلهی ستایش ِ ما
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| (که بیادعاتر کسانایم) |
| در ویرانههایش |
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| به رگبار ِ نفرت میبندند. |
